Chhat Puja

 

जय छठी मइया ! छठ पूजा और बचपन की यादें     छठ पूजा, यह बस एक त्यौहार ही नहीं, बल्कि एक भावना है। यह एक ऐसी भावना है जो हर एक बिहारी और पूर्वांचल के व्यक्ति के दिल में बसी हुई है। जब भी कहीं किसी भी बिहारी या पूर्वांचल के व्यक्ति के कानों में शारदा सिन्हा के गीत की आवाज पड़ती है तो बस सबको उनके गांव तथा छठ पर्व की याद आ जाती है। सभी को छठ का गीत सुनते ही अपना गांव और गांव के पास का घाट याद आने लगता है। पुराने समय में जब हर जगह बिजली नहीं हुआ करती थी तब दिवाली और छठ के त्यौहार के दिन सभी लोग अपने अपने घरों के सामने तथा सड़कों पर और आसपास के नदी तालाबों के घाट पर इतने सारे दीपक जलाया करते थे कि इसके सामने आजकल की रंगीन बल्ब भी फेल है। आज भले ही हमारे पास चाहे जितने मर्जी बिजली की लाइट आ गई हो मगर आज हम सभी को वो पुराने तेल के दीपक याद आते हैं। दीपक की लौ के झिलमिलाहट कहीं खो गई है।  आजकल के बिहार तथा पूर्वांचल के सभी युवा रोजगार के लिए अपने अपने गांव को छोड़कर शहरों में जा बसे हैं। कितने ही ऐसे लोग होंगे जो त्योहारों पर अपने घर जाना भी नसीब नहीं कर पाते होंगे। क्योंकि उनको ऑफिस में होली.













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