कविता

 एक कविता हर माॅं के नाम

घुटनों से रेंगते-रेंगते कब पैरो पे खरा हुआ,
तेरी ममता कि छाॅंव मे  न जाने कब मैं बरा हुआ। 
काला टिका दुध-मलाई आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हुॅं हर जगह  प्यार ये तेरा कैसा हैं।
सिधा-साधा भोला-भाला मैं ही सबसे अच्छा हुॅं,
कितना भी हो जाऊॅं बरा माॅं ! मै आज भी तेरा बच्चा हुॅं ......मै आज भी तेरा बच्चा हुॅं।






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