MAA
माॅं
गर-दिसे मेरा बिगारेगी मै माॅं के खैंचे हुये हजार मे से एक हुॅं। लाख गिर्द अपने हिफ़ाजत की लकीरे खीचो एक मे भी नही माॅं की दुआओ जैसी।
मुझे मुहब्बत है अपने हाथो की तमाम उंगलियो से ना जाने कोन से उगलिया पकर कर मा ने चलना सिखाया होगा
मुख्तशर-सी जिन्दगी होते हुए बढ जाएगी मा की आखे चुम लिजिए रोशनी बढ जाएगी
हालात बुरे थे मगर रखती थी नवाब बना कर हम गरीब थे ये सिर्फ़ मा जनती थी चुम लेना उदासिया सारी कोइ माॅं की मिसाल था ही नही ।
उम्र भर तेरी मुह्ब्बत मेरी खिदमत करती रही मै जब तेरी खिदमत के काबिल जब हुआ चल-बसी ।
दर्द चला जाता है मेरे घर की दहलिज से उदास होकर परेशान नही होता मै कभी अपने मा के पास बैठकर। वो लोरियो मे सुनाति थी आयते मुझको मै मा की याद मे इसको खुदा को चुमता हु तेरे हाथ के करामत की बात ही क्या मा मुझको तो तेरे कदमो की मिट्टी भी शिफ़ा देती है मा।
कहते है की पहला प्यार कभी भुलाया नही जाता फ़िर पता नही लोग मा-बाप का प्यार कैसे भुल जाते है । जन्नत तो सभी मान्गते है पर मिली हुई जन्नत की कोइ कदर नही करता , खुदा ने ये शिफ़त सिर्फ़ औरत को बखशी है के वो पागल भी हो जाए तो औलाद याद रहती है ।
कभी मा-बाप याद आए तो बहन-भाई मिलकर बैठा करो किसी के चेहरे पे मा मुशकुराती नजर आएगी तो किसी के लेहजे पे बाप फ़िर तेरे गम को छुपाते का बहाना डुंढा फ़िर किसी कब्र पे जा बैठ जाता हु
मा से मुहब्बत करो क्योकि मा की परेशानी को देखकर अल्लाह-त-आला ने शफ़ा-मरबा को हज का रुकन बना दिया
कुछ वक्त बैठा करो बुजर्गो के पास हर चीज नही मिलती Google के पास
रोनक मा-बाप से ही होती है उनके जाने के बाद चाहे जितनी भी आशाइशे हो चेहरे पे यतिमी आ ही जाती है
Written By; Ghazi Moeenuddin Farooque


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